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पत्रकारिता के क्षेत्र में मार्गदर्शक एवं प्रेरणास्रोत रहे स्वर्गीय टी.आर.महिन्द्रा

  • Jan 30
  • 2 min read

लुधियाना 30 जनवरी,2026

पत्रकारिता के क्षेत्र में मार्गदर्शक एवं प्रेरणास्रोत रहे महान पत्रकार स्वर्गीय टी.आर.महिन्द्रा की आज 30 जनवरी को 28वीं बरसी है। देश और पंजाब के लिए उनके बलिदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता। श्री टी.आर महिन्द्रा एक स्वतंत्र विचार वाले पत्रकार रहे जिन्होंने 60 वर्षों से अधिक समय तक ईमानदारी के साथ अपने पेशे की सेवा की। वर्ष 1938 में उन्होंने लाहौर से प्रकाशित 'मिलाप' में काम शुरू करके अपने जीवन की शुरुआत की। जिसके बाद उन्होंने देश भर के प्रमुख अंग्रेजी अखबारों, एजेंसियों के साथ-साथ जालंधर के कई अखबारों में डेस्क और फील्ड में काम किया।स्व. महिन्द्रा ने स्वतंत्रता संग्राम में महात्मा गांधी और पंडित नेहरू के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम किया देश की आजादी से पहले उन्होंने देश को आजाद कराने में योगदान दिया और साल 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान उन्हें जेल की सजा भी काटनी पड़ी। आजादी के बाद वह 20 साल तक अंग्रेजी अखबार ट्रिब्यून से जुड़े रहे। उस समय पत्रकारिता के पेशे में बहुत कम लोग पढ़े-लिखे थे, जिस कारण वे ट्रिब्यून के साथ-साथ कई भाषाई अखबारों में भी काम करते रहे। कई राजनीतिज्ञ उनके पास सलाह के लिए आया करते थे। ऐसे में वह अखबारों में भी राजनीति संबंदी लेख लिखा करते थे। उनके कई मुख्यमंत्रियों से व्यक्तिगत संबंध थे, लेकिन उन्होंने उनसे कोई व्यक्तिगत लाभ नहीं लिया। जब पंजाब में आतंकवादी तूफ़ान शुरू हुआ तो उन्होंने उसी तरह संघर्ष किया जैसे उन्होंने देश को आज़ाद कराने के लिए काम किया था। आतंकवादियों के कई संगठनों द्वारा लगातार मिल रही धमकियों से वे निडर रहे,जब कोई भी पत्रकार इस तूफ़ान के डर से फ़ील्ड में जाने से कतराता था। उनका कहना था कि देश की सेवा करना एक पत्रकार का मुख्य कर्तव्य है, जिसके लिए सरकारी लाभ का लालच नहीं करना चाहिए। अपने जीवनकाल में उन्होंने एक उर्दू अखबार 'रोज़ाना समाज' भी शुरू किया और अखबार में सामाजिक बुराइयों का कड़ा विरोध करते थे। दिवंगत टी.आर.महिन्द्रा का जन्म साल 1918 में जालंधर जिले के गांव कोट बादल खां में हुआ था। उन्होंने अपनी प्राथमिक शिक्षा लुधियाना के आर्य स्कूल में प्राप्त की और छोटी-मोटी नौकरियाँ करके भी अपना जीवन निर्वाह किया। अपने कॉलेज के दिनों में वह बालीवाल के चैंपियन थे और उन्होंने लाहौर में अपनी टीम को जीत दिलाकर पंजाब को गौरवान्वित किया और जीती हुई कुछ पुरस्कार राशि से अपना गुजारा किया। अप्रैल 1992 में, वह एक कार में यात्रा कर रहे थे और एक सड़क दुर्घटना का शिकार हो गये, जिसके बाद वह कई महीनों तक अस्पताल में रहे। कुछ हद तक ठीक होने के बाद उन्होंने एक बार फिर अपना दिल पत्रकारिता के पेशे की ओर मोड़ लिया।लेकिन सेहत ने साथ नहीं दिया और आज 30 जनवरी 1998 को उनकी जान चली गई और उन्होंने अपना शरीर छोड़ दिया और इस दुनिया को अलविदा कह गए।


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